राजस्थान क्यो उपेक्षित हैं।

 खम्मा घणी जय माताजी की,

आज हम इस ब्लॉग में राजस्थान की वास्तविकता और देश के पटल पर राजस्थान का क्या मान और सन्मान और क्या आज तक मिला और क्या राजस्थान ने देश के निर्माण में अपना योगदान दिया। मैं आज बहुत व्यथित हूँ। जब सुनता हूँ कि राजस्थान की भाषा मान्यता पयार्प्त नही हैं। 

आज देश को आजादी मिले 73-74 साल हो गए। देश के सभी राज्यो की अपनी अपनी मान्यता प्राप्त भाषा हैं। सभी राज्यो में अपनी अपनी भाषा का विकास और विचार पूर्ण और सदैव विकसित हैं। 

पंजाब,महाराष्ट्र,केरल,ओडिशा,बंगाल,गुजरात,द्रविड़,उत्कल,बिहार,उत्तर प्रदेश व अन्य सभी राज्यो में अपना अपना रंग और राग हैं। मान्यता प्राप्त भाषा हैं। अपने अपने राज्यो की फ़िल्म निर्माण से लेकर साहित्यिक प्रगति हैं। जिसके बल पर करोड़ो लोगो को रोजगार से जुड़े हैं। प्रत्येक राज्य की भाषा को राज्य की शिक्षा व स्कूलों से जुड़ी हैं। 

राज्य सरकारों में राज्य की भाषा की मान्यता के कारण आज देश के अन्य राज्य प्रगति के पथ पर लगातार अग्रसर हैं।

फिर ऐसा क्या कारण हैं कि राजस्थानी भाषा को मान्यता नही मिल रही हैं।

जबकि देश आज आजादी से लेकर इस क्षण तक लाखो नामुमकिन कामो व मतो को अंजाम दे चुका हैं। क्या राजस्थान की भाषा और प्रगति का मिलन नही हो सकता। 

राजस्थान में भी अच्छे लेखक हुए हैं। अनगिनत कवि व विद्वानों से राजस्थान भरा पड़ा हैं। अनगिनत साहित्यों में राजस्थानी की माटी की महक हैं। फिर क्यों केंद्र व राज्य सरकार राजस्थानी भाषा को मान्यता नही दे रहे हैं। 

मुझे बिल्कुल यह कहते हुए तकलीफ और गहरा दुख हो रहा हैं। जो राजस्थान सदियो से मुगलो की दीवार बनकर अपने शीशो को माँ भारती की चरणों मे देता रहा,जिस राजस्थान के अनगिनत शहीद सेना व अर्धसैनिक बलो में रहे और भारत की आनबान और शान के लिए लड़े और अपने शीश माँ भारती के कदमो में चढ़ाते रहे। 

जो राजस्थान राजाओ का स्थान रहा जहाँ महाराणा प्रताप से लेकर अन्य अजय राजा हुए। जिस राजस्थान की गरिमा,पहनावा,महान5 पान,रहन- सहन,36 कौम के रीति रिवाज और संस्कृति के साथ साथ लाज शर्म,इज्जत व आबरू के लिए रानी पद्मनी का जोहर हो या हाड़ी रानी का मुण्डमाल।

राजस्थान क्या देश मे इतना पिछड़ा हुआ हैं कि बाकी राज्यो की अपनी राज्य भाषा हैं। लेकिन राजस्थान की नही। क्या राजस्थान देश के विकास में अपना योगदान नही देता। क्या राजस्थान के वासिंदे भारत के विकास में अपना योगदान नही देते।

क्या राजस्थान अपने पुत्रों को अपनी भाषा मे जीने और मरने रोजगार पाने और कला साहित्य और संस्कृति राग और रंग के लिए भाषा को मान्यता की अग्नि परीक्षा से नही गुजार सकता।

क्या राजस्थानी भाषा और उसका विकास कभी नही होगा।

क्या राजस्थान के साहित्यकारों के पास भाषा को मान्यता दिलाने का मादा नही हैं।

क्या राजस्थान के लोग सिर्फ अपना पेट भरने तक सीमित हैं।

क्या राजस्थान कि भाषा की मान्यता से स्कूलों में राजस्थानी की डिंगल और पिंगल नही पढ़ाई जाएगी। 

मैं एक राजस्थानी हूँ। मेरा नाम मोती सिंह राठौड़ हैं मैं जोधपुर राजस्थान का रहने वाला हूँ। मैं आज ऊपर लिखे लेख के माध्यम से आपको पूछना चाहता हूँ  कि क्या आप राजस्थान के नव निर्माण में मेरे साथ हैं। अगर हैं तो अपना साथ अवश्य दे। हम भाषा की मान्यता के लिए दिल्ली व जयपुर में अपनी बात अब कड़ी आलोचना के साथ रखेंगे। और जरूरत पड़ी तो आक्रोश रैली भी निकालेंगे। 

जय हिंद                  जय राजस्थान

लेखक 

मोती सिंह राठौड़

जोधपुर(राज)

7020654349 व्हाट्सएप्प और कॉलिंग नंबर।


 

Comments

  1. पैलपोत तो राजस्थानी नै खुद मानता देवो। बरत्यूं री भासा बणार मानता देवो। #आपणो_राजस्थान_आपणी_राजस्थानी_अभियान

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